deepaawli 2016

Deepavali Parw 2017 लक्ष्मी Pujan Vidhi Subha Mahurt In Hindi

दीवाली महालक्ष्मी पूजन विधि शुभ मुहूर्त दीपावली निबंध Deepavali Parw 2017 लक्ष्मी पूजन Puja Vidhi Subha Mahurt

deepawli

लक्ष्मी पूजा

19वाँ अक्टूबर 2017 (ब्रहस्पतिवार )

दीवाली या दीपावली अर्थात “रोशनी का त्योहार” शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है। दीपावली का त्यौहार भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।दीपावली का अर्थ दीपो कई आवली या दीपो कई पंक्ति से लिया गया है ,

भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। दीपावली का त्यौहार कार्तिक माह कई अमावस्या को मनाया जाता हैं ,इसे भारत में ही नही बल्कि पुरे विश्व में बड़ी धूमधाम व ख़ुशी के साथ मनाया जाता हैं |भारतीय धार्मिक ग्रंथो व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता हैं की इस दिन भगवान श्री राम ने अपने चोदह वर्ष के वनवास में रावण को मारकर इस दिन अयोध्या को वापिस लौटे थे।

अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा श्री राम के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं दीपावली का त्यौहार अक्टूबर या नवंबर महीने में आता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीपावली की तैयारियाँ कई दिनों पहले ही शुरू हो जाती हैं | लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

पूजन सामग्री : –

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महालक्ष्मी पूजन में रोली, , कुमकुम, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, दीपक, रुई, कलावा (मौलि), नारियल, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल, जौ, गेहूँ, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, घृत, पंचामृत, दूध, मेवे, खील, बताशे, गंगाजल, यज्ञोपवीत, श्वेत वस्त्र, इत्र, चौकी, कलश, कमल गट्टे की माला, शंख, लक्ष्मी व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, मिष्ठान्न, 11 दीपक इत्यादि वस्तुओं को पूजन के समय रखना चाहिए।

दीपावली पूजन विधि :-

सर्वप्रथम गणेश और लक्ष्मी का पूजन करें।

दीपक पूजन:
दीपक जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर जीवन में ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है। दीपावली के दिन पारिवारिक परंपराओं के अनुसार तिल के तेल के सात, ग्यारह, इक्कीस अथवा इनसे अधिक दीपक प्रज्वलित करके एक थाली में रखकर कर पूजन करने का विधान है।

उपरोक्त पूजन के पश्चात घर की महिलाएं अपने हाथ से सोने-चांदी के आभूषण इत्यादि सुहाग की संपूर्ण सामग्रियां लेकर मां लक्ष्मी को अर्पित कर दें। अगले दिन स्नान इत्यादि के पश्चात विधि-विधान से पूजन के बाद आभूषण एवं सुहाग की सामग्री को मां लक्ष्मी का प्रसाद समझकर स्वयं प्रयोग करें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।

अब श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।

पूजा के दौरान हुई किसी ज्ञात-अज्ञात भूल के लिए श्रीलक्ष्मी से क्षमा-प्रार्थना करें।

न मैं आह्वान करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वरि! मुझे क्षमा करो। मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे देवि! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो।
यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे भगवती श्रीलक्ष्मी प्रसन्न हों।

भगवती श्रीलक्ष्मी को यह सब पूजन समर्पित है….

लक्ष्मी पूजा :-

प्रदोष काल मुहूर्त

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त = 18 :02 से 20:20
अवधि = 1 घण्टा 42 मिनट्स
प्रदोष काल = 17:33 से 20:09
वृषभ काल = 18 : 27 से 20:22
अमावस्या तिथि प्रारम्भ = 29/अक्टूबर/2016 को 20:40 बजे
अमावस्या तिथि समाप्त = 30/अक्टूबर/2016 को 23:08 बजे

महानिशिता काल मुहूर्त

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त = कोई नहीं
अवधि = 0 घण्टे 0 मिनट्स
महानिशिता काल = 23:38 से 24:30+
सिंह काल = 24:57+ से 27:17+
अमावस्या तिथि प्रारम्भ = 29/अक्टूबर/2016 को 20:40 बजे
अमावस्या तिथि समाप्त =30/अक्टूबर/2016 को 23:08 बजे

चौघड़िया पूजा मुहूर्त

दीवाली लक्ष्मी पूजा के लिये शुभ चौघड़िया मुहूर्त
प्रातःकाल मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) = 07:58 – 12:05
अपराह्न मुहूर्त (शुभ) = 23:27: – 24 :49
सायंकाल मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) = 17:33 – 22:27

दीपावली पर निबंध / Essay on Deepawali in Hindi!

दीपावली को दीवाली के नाम से भी जाना जाता है । दीपावली हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है । इसे कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है । यह प्रकाश पर्व है । इस दिन घर-घर प्रकाश से जगमगा उठता है ।

दीपावली एक दिन का पर्व नहीं, अपितु कई पवों का समूह है जो कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की दूज तक बहुत हर्षोल्लास से संपन्न होता है । ये पर्व हैं- धन त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज ।

दीपावली के दिन रात्रिकाल में धन-संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी जी और विघ्नविनाशक व मंगलदाता गणेश जी की पूजा की जाती है । समुद्र-मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी भी एक रत्न थीं । लक्ष्मी रत्न का प्रादुर्भाव कार्तिक मास की अमावस्या को हुआ था । उस दिन से कार्तिक की अमावस्या लक्ष्मी-पूजन का त्योहार बन गया । लक्ष्मी के साथ-साथ गणेश की पूजा की जाती है क्योंकि गणेश धन-संपत्ति की संरक्षा करते हैं तथा सब प्रकार के अमंगलों का नाश कर सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं ।

दीपावली के मनाने के पीछे एक कथा यह भी है कि भगवान राम इसी दिन रावण संहार के उपरांत पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण समेत अयोध्या लौटे थे । चौदह वर्ष के वनवास से लौटने की उमंग में अयोध्यावासियों ने अपने- अपने घर सजाए थे तथा रात को घरों में विशेष रोशनी की थी । तब से दीपावली के दिन लोग अपने सजे हुए घर में दीप जलाते हैं तथा प्रकाश-व्यवस्था करते हैं ।

इस त्योहार का संबंध फसल से भी है । इस समय खेतों में नई फसल पकने लगती है । किसान नइ फसल रूपी धन-लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए उत्सव मनाते हैं । फसल रखने के लिए खलिहान और घरों को लीप-पोत कर तैयार कर लिया जाता है । इससे बरसात के कारण हुई क्षति की भरपाई भी होती है । रात को असंख्य दीप जलते हैं जिनमें कीट-पतंगे और मच्छर नष्ट हो जाते हैं । घर-आँगन साफ-सुथरा दिखाई देने लगता है । शहरों में भी लोग अपने घर से कूड़ा-करकट निकाल कर दीवारों की पुताई करते हैं । व्यापारी अपना पुराना हिसाब-किताब निबटाकर नए बही-खाते तैयार करते हैं ।

दीवाली के पहले से ही बाजार सज जाते हैं । लोग नए वस्त्रों की खरीदारी करते हैं । व्यापारी दुकानें सजाते हैं । ग्राहकों के आवागमन की गति बढ़ जाती है । हलवाई स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनाकर उनकी नुमाशन करते हैं । कुम्हार मिट्‌टी के दीए लेकर बाजार आ पहुँचते हैं । कपास और खील-बताशे बेचने वालों की संख्या बढ़ जाती है । कुछ लोग चाँदी के सिक्के खरीदते हैं तो कुछ गहने । दूसरों को भेंट देनेवाली चीजों की माँग बढ़ जाती है । चहुँ ओर उल्लास होता है । खरीदार और विक्रेता दोनों खुश नजर आते हैं । पुलिस की गश्त बढ़ जाती है क्योंकि उसे सुरक्षा का विशेष प्रबंध करना होता है ।

दीपावली के दिन हर कोई व्यस्त दिखाई देता है । गृहणियाँ घर में विशेष पकवान बनाती हैं । बच्चे खरीदे गए बम-पटाखों को धूप में सुखाते हैं । कामकाजी लोग कार्यालय से उपहार प्राप्त कर खुश दिखाई देते हैं । दुकानदार दुकान में पूजा की तैयारियों में जुटे होते हैं । लोग एक-दूसरे को भाँति- भाँति के उपहार और दीपावली की बधाइयाँ देते हैं । लोग पुष्पमालाएँ, पूजा की अन्य सामग्रियाँ, मोमबत्ती तथा लक्ष्मी-गणेश की छोटी-छोटी मूर्तियाँ खरीदते हैं । पंडित जी गृहकार्य निबटाकर दुकान-दुकान, घर-घर पूजा-पाठ कराने निकल पड़ते हैं । बच्चे शाम होने की प्रतीक्षा अधीरतापूर्वक करते हैं ताकि वे आतिशबाजी का आनंद ले सकें ।

संध्या का समय आता है । घर-घर दीयों, मोमबत्तियों तथा बिजली के रंगीन बल्बों और झालरों से जगमगा उठते हैं । ऐसा लगता है मानो आसमान के सभी तारे धरती पर उतर आए हों । बड़ा अद्‌भुत दृश्य होता है यह । भारत- भूमि पर स्वर्ग का समाँ बँध जाता है । इसके साथ ही बम-पटाखों और फुलझड़ियों की ध्वनि और चमत्कार होने लगता है । पूरे देश में अरबों रुपये इन दो-चार घंटों में फूँक दिए जाते हैं क्योंकि अब दीपावली प्रकाश-पर्व ही नहीं रह गया है, यह ध्वनि पर्व भी बन गया है । इस ध्वनि पर्व के कारण प्रदूषण का स्तर भी बेहिसाब बढ़ जाता है ।

दीप जले, पटाखे फूटने लगे और लक्ष्मी-गणेश पूजा आरंभ हो गई । शंख बज उठे । पूजा समाप्त हुई तो प्रसाद बाँटे गए । पड़ोसी एक-दूसरे को प्रसाद और उपहार देने गए । भाईचारे की भावना को बल मिला । घर-घर में आनंद के सुखद क्षण आए । लोग मिठाइयाँ खाने लगे । एक से बढ्‌कर एक पकवानों को खाने-खिलाने का सिलसिला चल पड़ा । परिवार के सब लोग इकट्‌ठे होकर फुलझड़ियाँ छोड़ने लगे । कुछ लोग छत पर चढ़कर नगर की सजावट देखने लगे । कुछ तामसिक प्रवृत्ति के लोग रतजगा करते हुए जुआ खेलने और मदिरापान करने की तैयारियों में जुट गए ।

इस तरह त्योहार की समाप्ति आ गई । त्योहार तनाव दूर कर गया और लोग अपने- अपने कामों में नए सिरे से जुट गए ।
दीपावली का महत्व : –

दीपावली का महत्व दवाली का पर्व कार्तिक अमावस्या के दिन, हर वर्ष, मनाया जाता है। क्योंकि राम रात्रि में अयोध्या वापिस आये थे और अमावस की रात थी, इसलिए अयोध्यावासियों ने पूरे शहर को दीपकों से जगमगा दिया था। दीवाली से दो बातों का गहरा संबंध है- एक तो लक्ष्मी पूजन और दूसरा राम का लंका विजय के बाद अयोध्या लौटना। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस महापर्व पर रघुवंशी भगवान श्री राम की रावण पर विजय के बाद अयोध्या आगमन पर नागरिकों ने दीपावली को आलोक पर्व के रूप में मनाया। तभी से यह दीप महोत्सव राष्ट्र के विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है। दीपावली अपने अंदर प्रकाश का ऐसा उजियारा धारण कर आती है, जिसके प्रभाव से अनीति, आतंक और अत्याचार का अंत होता है और मर्यादा,नीति और सत्य की प्रतिष्ठा होती है। भगवान श्री राम की जन्मभूमि व राज्य अयोध्या में था, इसलिए दीपावली का महापर्व उत्तरप्रदेश, विशेषकर अयोध्या में, बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। दीपावली के रूप में विख्यात आधुनिक महापर्व स्वास्थ्य चेतना जगाने के साथ शुरू होता है। त्रयोदशी का पहला दिन धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है। लोग इसे धनतेरस भी कहते हैं और पहले दिन का संबंध धन वैभव से जोड़ते हैं। धन्वंतरि जयंती का संबोधन घिस-पिटकर धनतेरस के रूप में प्रचलित हो गया। वस्तुतः यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है। चतुदर्शी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध तो किया ही था, इसी दिन हनुमान जी का जन्म भी हुआ था। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दीपावली बंधन मुक्ति का दिन है। व्यक्ति के अंदर अज्ञानरूप अंधकार का साम्राज्य है। दीपक को आत्म ज्योति का प्रतीक भी माना जाता है। अतः दीप जलाने का तात्पर्य है- अपने अंतर को ज्ञान के प्रकाश से भर लेना, जिससे हृदय और मन जगमगा उठे। इस दिन चतुर्दिक तमस् में ज्योति की आभा फैलती एवं बिखरती है।

दिवाली आई; खुशिया लाई;
बिछडा था जिनके साथ बचपन में;
फूलजदियाँ उनकी याद लाये.
क्या हुआ अगर साथ नहीं आज उनके
उनकी याद लिए ये दिवाली तो आये. “हैप्पी दिवाली”

 

इस बार दीपावली को सोने चांदी में चमक आएगी

देश के सभी नागरिको व देश कई रक्षा करने वाले जवानो के हार्दिक शुभ कामनाए ,

सावधानी पूर्वक मनाए दिवाली |

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