Rakshabandhan Mnane Ki Widhi For Congratulation Rakhi 18 August 2016

Rakshabandhan Mnane Ki Widhi For Congratulation Rakhi 07 August 2017

Rakshabandhan Subha Mhurat राखी बाँधने का समय

इस वर्ष रक्षाबंधन का त्योहार 07 अगस्त 2017 सोमवार पूर्णिमा को सुबह 11:04 से 20:38 बजे के मध्य मनाया जाएगा

दिनांक :- 7 अगस्त 2017

दिन :- सोमवार

रक्षा बन्धन समय – 11:04 से 20:38

अवधि – 9 घण्टे 33 मिनट

...

अपराह्न का मुहूर्त – 13:13 से 15:50

पूर्ण अवधि – 2 घण्टा 36 मिनट

पूर्णिमा तिथि आरम्भ – 6 अगस्त 2017 को 22:28 बजे से

पूर्णिमा तिथि समाप्त – 7अगस्त 2017 को 23:40 बजे

भद्रा पूँछ – 06:40 से 07:55
भद्रा मुख – 07:55 से 10:01
भद्रा अन्त समय – 11:04

Rakshabandhan

रक्षाबंधन के दिन का पञ्चाङ्ग | Panchang of Rakshabandhan day

तिथि – पूर्णिमा

नक्षत्र – श्रावण 27:33

करन -विष्टि 11:10

पक्ष – शुक्ल

योग – आयुष्मान

दिन – सोमवार

राहु काल – 7:25:52 से 9:06:10

Rakshabandhan Mnane Ki Widhi For Congratulation Rakhi 18 August 2016

तीन साल बाद रक्षाबंधन पर नहीं होगी भद्रा, सिंहासन गौरी योग में बंधेंगी राखियां

रक्षाबन्धन (अंग्रेज़ी : Raksha Bandhan) हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है | रक्षाबन्धन श्रावण मास के अंत में आता हैं | इस समय इंद्र देवता खुश होकर वर्षा करतें हैं | जिससे प्रक्रति भी हरियाली से अपना श्रृंगार कर लेती हैं | जिससे मन को हरने लगती हैं |इससे रक्षाबन्धन के त्योहार की रोनक कुछ अलग ही नजर आती हैं | और जो श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह भाई-बहन को स्नेह की डोर से बांधने वाला त्योहार है। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है।

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रक्षाबंधन का अर्थ
रक्षाबंधन का अर्थ है (रक्षा+बंधन) अर्थात किसी को अपनी रक्षा के लिए बांध लेना। इसीलिए राखी बांधते समय बहन कहती है- ‘भैया! मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मेरी सब प्रकार से रक्षा करना।’ आज के दिन बहन अपने भाई की दाहिनी कलाई या हाथ को राखी बांधती है और उन्हें मिठाई खिलाती है। फलस्वरूप भाई भी अपनी बहन को रुपये ,उपहार और रक्षा करने का वचन आदि देता हैं। रक्षाबंधन स्नेह का वह अमूल्य व अटूट बंधन है जिसका बदला धन तो क्या सर्वस्व न्योछावर करके भी नहीं चुकाया जा सकता। इस दिन जिस बहन के कोई भाई नहीं होता हैं तो वह सोचती हैं मेरे भी कोई भाई हो और मै उसके राखी बांदू और जिस भाई के बहन नही वह तो अकेलापन महसूस करता हैं | तो इस स्थति में भाई को धर्म की बहन से राखी बंधवाना चाहिए और उसकी रक्षा करनी चाहिए | जिससे उसे पुण्य की प्राप्ति होती हैं |

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रक्षासूत्र
भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए दो भाई – बहन के हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है।

Rakshabandhan Mnane Ki Widhi For Congratulation Rakhi 18 August 2016

रक्षा बंधन की क्या है पूजा-विधि, मंत्र व इतिहास
हिन्दू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को ( अगस्त माह में ) रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है। इसे आमतौर पर भाई-बहनों का पर्व मानते हैं लेकिन, अलग-अलग स्थानों एवं लोक परम्परा के अनुसार अलग-अलग रूप में रक्षाबंधन का पर्व मनाते हैं। इस रिश्ते को रसूख तभी मिल सकता है, जब हम इसे तहेदिल से मानें। राखी भद्रा काल में नहीं बांधना चाहिए। इस समय रक्षाबंधन करने पर दोष लगता है और भाई के लिए मांगी गई दुआएं असर नहीं करती हैं। इसलिए भद्रा काल समाप्त होने के पश्चात ही राखी बांधना शुभ होता है।

रक्षा बंधन के पर्व की वैदिक विधि -वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि :
इसके लिए ५ वस्तुओं की आवश्यकता होती है –

(१) दूर्वा (घास)
(२) अक्षत (चावल)
(३) केसर
(४) चन्दन
(५) सरसों के दाने ।
इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकार वैदिक राखी तैयार हो जाएगी ।

इन पांच वस्तुओं का महत्त्व –

(१) दूर्वा – जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बदता जाए । दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए ।
(२) अक्षत – हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे ।
(३) केसर – केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो ।
(४) चन्दन – चन्दन की प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे ।
(५) सरसों के दाने – सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें ।

इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम भगवान -चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे ।
इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सूखी रहते हैं ।

राखी बाँधते समय बहन यह मंत्र बोले –
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: |
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल ||
शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय –
‘अभिबन्धामि ‘ के स्थान पर ‘रक्षबन्धामि’ कहे |

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रक्षा बंधन पर्व मनाने की विधि –

श्रावण मास की पूर्णिमा रक्षा बंधन के दिन सुबह भाई-बहन स्नान करके भगवान की पूजा करते हैं। इसके बाद बहन रोली, अक्षत, कुंमकुंम एवं दीप जलाकर थाल सजाती हैं। इस थाल में रंग-बिरंगी राखियों को रखकर उसकी पूजा करते हैं फिर बहनें भाइयों के माथे पर कुंमकुंम, रोली एवं अक्षत से तिलक लगती हैं। इसके बाद भाई की दाईं कलाई पर रेशम की डोरी (नाळ की राखी) से बनी राखी बांधती हैं और मिठाई से भाई का मुंह मीठा कराती हैं। राखी बंधवाने के बाद भाई बहन को रक्षा का आशीर्वाद एवं उपहार व गिफ्ट देता है। बहनें राखी बांधते समय भाई की लम्बी उम्र एवं सुख तथा उन्नति की कामना करती है। राखी भद्राकाल को टाल कर शुभ महूर्त में बाँधी जाती हैं |

रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व-
भाई बहनों के अलावा पुरोहित भी अपने यजमान को राखी बांधते हैं और यजमान अपने पुरोहित को। इस प्रकार राखी बंधकर दोनों एक दूसरे के कल्याण एवं उन्नति की कामना करते हैं। प्रकृति भी जीवन के रक्षक हैं इसलिए रक्षाबंधन के दिन कई स्थानों पर वृक्षों को भी राखी बांधा जाता है। ईश्वर संसार के रचयिता एवं पालन करने वाले हैं अतः इन्हें रक्षा सूत्र अवश्य बांधना चाहिए। कई महिलाएं भगवान कृष्ण को भी राखी बांधती है जिससे भगवान उनकी रक्षा करें। रक्षाबंधन का पर्व भारतीय संस्कृति का ऐसा रत्न है जिसकी महीन किरणों में सुंदर रिश्ते झिलमिलाते हैं। एक नन्हें से रंगीन धागे में प्यार की दौलत गुंथी जाती है। श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन मनाया जाता है। इसे आमतौर पर भाई-बहनों का पर्व मानते हैं लेकिन, अलग-अलग स्थानों एवं लोक परम्परा के अनुसार अलग-अलग रूप में रक्षाबंधन का पर्व मानते हैं।

श्रावण की पूर्णिमा को अपरान्ह में एक कृत्य होता है, जिसे ‘रक्षाबन्धन’ कहते हैं। श्रावण की पूर्णिमा को सूर्योदय के पूर्व उठकर देवों, ब्राह्मणों एवं पितरों का तर्पण करने के उपरान्त अक्षत, तिल, धागों से युक्त रक्षा बनाकर धारण करना चाहिए। राजा के लिए महल के एक वर्गाकार भूमि-स्थल पर जल-पात्र रखा जाना चाहिए, राजा को मन्त्रियों के साथ आसन ग्रहण करना चाहिए, वेश्याओं से घिरे रहने पर गानों एवं आर्शीवचनों का ताँता लगा रहना चाहिए; देवों ब्राह्मणों एवं अस्त्र-वस्त्र का सम्मान किया जाना चाहिए, तत्पश्चात राजपुरोहित को चाहिए कि वह मन्त्र के साथ ‘रक्षा’ बाँधे’ और कहे– ‘आपको वह रक्षा बाँधता हूँ, जिससे दानवों के राजा बलि बाँधे गये थे, हे रक्षा, तुम (यहाँ से) न हटो, न हटो।’ सभी लोगों को यहाँ तक शूद्रों को भी, यथाशक्ति पुरोहितों को प्रसन्न करके रक्षा-बन्धन बँधवाना चाहिए। जब ऐसा कर दिया जाता है तो व्यक्ति वर्ष भर प्रसन्नता के साथ रहता है।

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भाई को राखी बांधती बहन
हेमाद्रि ने भविष्योत्तर पुराण का उद्धरण देते हुए लिखा है कि इन्द्राणी ने इन्द्र के दाहिने हाथ में रक्षा बाँधकर उसे इतना योग्य बना दिया कि उसने असुरों को हरा दिया। जब पूर्णिमा चतुर्दशी या आने वाली प्रतिपदा से युक्त हो तो रक्षा-बन्धन नहीं होना चाहिए। इन दोनों से बचने के लिए रात्रि में ही यह कृत्य कर लेना चाहिए। यह कृत्य अब भी होता है और पुरोहित लोग दाहिनी कलाई में रक्षा बाँधते हैं और दक्षिणा प्राप्त करते हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं अन्य स्थानों में नारियाँ अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा बाँधती हैं और भेंट लेती-देती हैं। श्रावण की पूर्णिमा को पश्चिमी भारत (विशेषतः कोंकण एवं मलाबार में) न केवल हिन्दू, प्रत्युत मुसलमान एवं व्यवसायी पारसी भी, समुद्र तट पर जाते हैं और समुद्र को पुष्प एवं नारियल चढ़ाते हैं। श्रावण की पूर्णिमा को समुद्र में तूफ़ान कम उठते हैं और नारियल इसीलिए समुद्र-देव (वरुण) को चढ़ाया जाता है कि वे व्यापारी जहाज़ों को सुविधा दे सकें |
रक्षा बंधन का इतिहास:-
भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलसिला बेहद प्राचीन है। रक्षाबंधन का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है। वह भी तब जब आर्य समाज में सभ्यता की रचना की शुरुआत मात्र हुई थी। रक्षाबंधन पर्व पर जहां बहनों को भाइयों की कलाई में रक्षा का धागा बांधने का बेसब्री से इंतजार है, वहीं दूर-दराज बसे भाइयों को भी इस बात का इंतजार है कि उनकी बहना उन्हें राखी भेजे। उन भाइयों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जिनकी अपनी सगी बहन नहीं है, क्योंकि मुंहबोली बहनों से राखी बंधवाने की परंपरा भी काफी पुरानी है।असल में रक्षाबंधन की परंपरा ही उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं। भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है। इतिहास के पन्नों को देखें तो इस त्योहार की शुरुआत की उत्पत्ति लगभग 6 हजार साल पहले बताई गई है। इसके कई साक्ष्य भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं।रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूं हैं। मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूं को राखी भेजी थी। तब हुमायूं ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था।

रक्षा बंधन पर कविता

रंग बिरंग नग-मनके जड़ी,
राखियां सजी छोटी-बड़ी,
समेटे धागे में स्नेह अपार,
आया राखी का त्यौहार ।।
दुकान भीड़ से अटी पड़ी,
बहन सोचती खड़ी-खड़ी,
भाई को ये वाली भाएगी?
क्या कलाई पर सुहाएगी?
कैसी राखी लें इस बार,
आया राखी का त्यौहार ।।
निहारे घड़ी बंधी कलाई,
स्नेह से मुस्कुराए भाई,
देख कर भड़क जाएगी,
दीदी घड़ी खुलवाएगी,
डांट में भी होगी मनुहार,
आया राखी का त्यौहार ।।
अभी राखी में थोड़े दिन शेष,
पर अभी से रौनक है छाई,
उत्साह से भरा सारा परिवेश,
पर थोड़ी कठिनाई में भाई,
इस बार क्या दूंगा उपहार?
आया राखी का त्यौहार ।।
तकनीक भी है पीछे नहीं,
“अंतरजाल” पर मने त्यौहार,
झट से भेजी विदेश भी,
राखी से “दूरी” मानी हार,
अटूट बंधन ये, गहरा प्यार,
आया राखी का त्यौहार ।।
कोई बहन भाई के संग,
त्यौहार के रंग में मनंग,
कोई लिखकर पंक्ति चार,
रोली टीके के संग प्यार,
भेजे सात समुंदर पार,
आया राखी का त्यौहार ।।

राखी रक्षाबन्धन 2017 भाई बहिन पर कविता

भाई – बहन का रिश्ता
खट्टा- मीठा , प्यारा -प्यारा
कभी लड़ते, तो कभी झगड़ते ..
एक – दूजे की चीजे भी छुपा देते है..
मम्मी – पापा की नाराजगी से बचने के लिए..
एक दूजे पर इल्जाम भी लगा देते है..
पर जब बारी आती है साथ देने की
तो हमेशा भाई को साथ पाती हूँ
मेरे जीवन के हर छोटे – बड़े
अहं फैसले में भाई ने साथ निभाया है..
हर कदम पर कुछ नया करने की आदत है मुझे..
रुकते नहीं कदम मेरे
पर मेरे कदमों की गति को
भाई ने ही तो बढ़ाया है…
मेरी हर अमूर्त कल्पना को
भाई ने ही मूर्त बनाया है..
जीती थी कल्पनाओं की दुनिया में
उसे भाई ने ही तो हकीकत बनाया है..
कुछ शर्ते ,, कुछ पाबंदी भी रहती है उसकी
पर इनमे झलकता है उसका प्यार
मेरी फिक्र जो करता है वो..
कच्ची डोर का पक्का रिश्ता
है भाई – बहन का रिश्ता
खट्टा- मीठा , प्यारा -प्यारा

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